‘होमबाउंड’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक आईना है जो समाज की कड़वी सच्चाई दिखाता है।
सिनेमा का असली मकसद क्या है? सिर्फ मनोरंजन करना या समाज को आईना दिखाना भी? डायरेक्टर नीरज घेवन (Neeraj Ghaywan) की फिल्म ‘होमबाउंड’ (Homebound) को देखने के बाद मेरा मानना है कि यह दूसरी बात को पूरी शिद्दत से साबित करती है। यह फिल्म कोई मसाला एंटरटेनर नहीं है, जिसे देखकर आप सीटी बजाएं और भूल जाएं। यह एक गहरा, मार्मिक और बेचैन कर देने वाला अनुभव है, जो थिएटर से निकलने के कई घंटों बाद भी आपके जहन में घूमता रहता है।
मैंने जब यह फिल्म देखी, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ जातिवाद या वर्गभेद की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन अनकही सच्चाइयों और असहज करने वाले सवालों की कहानी है, जिनसे हम आज भी भागते हैं। यह फिल्म आपको मनोरंजन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अहसास कराती है।
कहानी, जो दिल पर चोट करती है।
फिल्म की कहानी आधुनिक भारत की पृष्ठभूमि में सेट है, लेकिन यह उन गहरी जड़ों को कुरेदती है जो आज भी हमारे समाज को खोखला कर रही हैं। जातिगत भेदभाव का विषय इतना संवेदनशील है कि इसे पर्दे पर दिखाना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन नीरज घेवन ने इसे बिना किसी मेलोड्रामा के, पूरी ईमानदारी और संयम के साथ पेश किया है।
मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित इस बात ने किया कि फिल्म किसी पर दोष नहीं मढ़ती। यह आपको किसी से नफरत करने के लिए मजबूर नहीं करती, बल्कि यह आपको सोचने पर मजबूर करती है कि हम एक समाज के रूप में कहाँ गलत हो गए हैं। फिल्म के कई सीन ऐसे हैं जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाते हैं। यह खामोशी, यह ठहराव ही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।
अभिनय: ईशान और विशाल ने आत्मा फूंक दी।
अगर कहानी फिल्म का दिल है, तो ईशान खट्टर (Ishaan Khatter) और विशाल जेठवा (Vishal Jethwa) इसकी धड़कन हैं। दोनों ने अपने किरदारों को जिया है, निभाया नहीं। उनकी आंखों में दर्द, उनकी आवाज में बेबसी और उनके चेहरे पर संघर्ष साफ झलकता है।
ईशान खट्टर ने यह साबित कर दिया है कि वह सिर्फ एक कमर्शियल हीरो नहीं, बल्कि एक मंझे हुए कलाकार हैं जो किसी भी किरदार में ढल सकते हैं। वहीं, विशाल जेठवा का अभिनय आपको हिलाकर रख देगा। उन्होंने अपने किरदार की पीड़ा को इतनी गहराई से महसूस किया है कि आप उसे अपनी पीड़ा समझने लगते हैं। इन दोनों का प्रदर्शन असाधारण है और लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
डायरेक्शन और क्राफ्ट।
‘मसान’ के बाद मुझे नीरज घेवन से बहुत उम्मीदें थीं, और ‘होमबाउंड’ में उन्होंने उन उम्मीदों को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि उससे भी आगे निकल गए। उनका डायरेक्शन बहुत ही सधा हुआ है। वह जानते हैं कि कहाँ रुकना है और कहाँ कहानी को आगे बढ़ाना है।
फिल्म का कैमरा वर्क और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड को और भी गहरा बनाते हैं। कोई भी चीज लाउड या जबरदस्ती नहीं लगती। सब कुछ बहुत ही ऑर्गेनिक और रियल है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप कोई फिल्म नहीं, बल्कि किसी की असल जिंदगी का एक हिस्सा देख रहे हैं।
ऑस्कर की हकदार?।
इस फिल्म को ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर चुना गया है, और मेरी राय में यह बिल्कुल सही फैसला है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें वैश्विक दर्शकों से जुड़ने की क्षमता है, क्योंकि भेदभाव और अन्याय की कहानी किसी एक देश तक सीमित नहीं है।
भले ही यह बॉक्स ऑफिस पर 100-200 करोड़ न कमाए, लेकिन यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर के रूप में याद रखी जाएगी। यह उन फिल्मों में से है जो पैसे नहीं, बल्कि सम्मान और पुरस्कार कमाती हैं।
फाइनल वेडरिक्ट
अगर आप हल्के-फुल्के मनोरंजन की तलाश में हैं, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप एक ऐसा सिनेमा देखना चाहते हैं जो आपके दिल और दिमाग पर असर डाले, जो आपको सोचने पर मजबूर करे, और जो आपको एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करे, तो ‘होमबाउं’ को मिस मत कीजियेगा।
यह एक भारी फिल्म है, लेकिन यह एक जरूरी फिल्म है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे देखने के लिए हिम्मत चाहिए, और पचाने के लिए एक खुला दिमाग।
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