क्रिकेट के मैदान पर जब खेल से ज्यादा राजनीति हावी होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि मामला वर्चस्व का है। इन दिनों इंग्लैंड की पेशेवर क्रिकेट लीग The Hundred को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की जड़ में है पाकिस्तानी खिलाड़ियों की कथित अनदेखी, लेकिन इसकी असली परतें BCCI के बढ़ते वैश्विक प्रभाव से जुड़ी हुई हैं। इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटरों की बेचैनी बता रही है कि उन्हें अब भारतीय बोर्ड का ‘राज’ चुभने लगा है।
🧐 क्या है ‘द हंड्रेड’ विवाद की असली वजह?
हाल ही में ब्रिटिश मीडिया में ऐसी रिपोर्ट्स आईं कि ‘द हंड्रेड’ में निवेश करने वाली भारतीय आईपीएल (IPL) फ्रेंचाइजियां पाकिस्तानी खिलाड़ियों को अपनी टीमों में शामिल नहीं करेंगी। हालांकि अभी नीलामी (Auction) की तारीखें मार्च में तय हैं, लेकिन उससे पहले ही माइकल वॉन और Harry Brook जैसे खिलाड़ियों ने इसे ‘शैडो बैन’ का नाम देकर मोर्चा खोल दिया है।
हकीकत यह है कि पिछले 5 सालों में बहुत ही कम पाकिस्तानी खिलाड़ी इस लीग का हिस्सा बन पाए हैं। जब निवेशक अपना पैसा लगाता है, तो वह खिलाड़ियों की उपलब्धता और प्रदर्शन को देखता है। लेकिन इंग्लैंड के पूर्व कप्तान इसे ‘समावेशी भावना’ के खिलाफ बताकर सीधा निशाना भारतीय निवेशकों और बीसीसीआई पर साध रहे हैं।
💰 The Hundred में भारतीय निवेश: एक बड़ा फैक्टर
ईसीबी (ECB) के अधिकारी जानते हैं कि लीग को सफल बनाने के लिए पैसा कहां से आ रहा है। ‘द हंड्रेड’ की प्रमुख टीमों में भारतीय आईपीएल मालिकों की बड़ी हिस्सेदारी है:
- MI London: मुंबई इंडियंस का स्वामित्व।
- Southern Brave: दिल्ली कैपिटल्स की हिस्सेदारी।
- Sunrisers Leeds: सनराइजर्स हैदराबाद का मालिकाना हक।
- Manchester Super Giants: लखनऊ सुपर जायंट्स का निवेश।
🔥 माइकल वॉन और हैरी ब्रूक की ‘खीज’ के पीछे का सच
इंग्लैंड की टेस्ट टीम के कप्तान Harry Brook ने बयान दिया कि “पाकिस्तान एक महान देश है और उनके खिलाड़ियों को न देखना शर्मनाक होगा।” वहीं माइकल वॉन ने ईसीबी से इस पर एक्शन लेने की मांग की है। Cricket News Hindi के अनुसार, यह चिंता पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए कम और बीसीसीआई के रुतबे के खिलाफ ज्यादा है।
आज आईसीसी (ICC) के कुल राजस्व का लगभग 80% हिस्सा अकेले भारत से आता है। कभी क्रिकेट की दिशा इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया तय करते थे, लेकिन आज ‘क्रिकेट की राजधानी’ दिल्ली (BCCI) बन चुकी है। यही आर्थिक और रणनीतिक मजबूती इंग्लैंड के दिग्गजों को अंदर ही अंदर परेशान कर रही है।
📉 पाकिस्तान-बांग्लादेश का ‘कंधा’ और इंग्लैंड की राजनीति
यह पहली बार नहीं है जब इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटरों ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान या बांग्लादेश का सहारा लिया हो। चैंपियंस ट्रॉफी के लिए भारत का पाकिस्तान न जाना हो या मुस्तफिजुर रहमान विवाद, नासिर हुसैन और माइक एथर्टन जैसे लोग हमेशा आईसीसी पर भारत के पक्ष में झुकने का आरोप लगाते रहे हैं।
वे यह भूल जाते हैं कि सुरक्षा और कूटनीति खेल से कहीं बड़े पहलू हैं। इंग्लैंड के इन दिग्गजों का विरोध अब एक ‘क्रिकेट एक्सपर्ट’ के बजाय एक ‘हारे हुए प्रतिद्वंद्वी’ की चिढ़ जैसा ज्यादा नजर आता है। उन्हें डर है कि जिस खेल को उन्होंने जन्म दिया, उसका पूरा नियंत्रण अब भारत के हाथों में है।
| पहलु | इंग्लैंड का पक्ष | वास्तविक स्थिति |
|---|---|---|
| खिलाड़ियों का चयन | पाकिस्तानी खिलाड़ियों को जानबूझकर रोका जा रहा है। | चयन उपलब्धता और टीम मालिकों की पसंद पर आधारित है। |
| लीग का नियंत्रण | ईसीबी को खिलाड़ियों के चयन में दखल देना चाहिए। | लीग में पैसा भारतीय निवेशकों का भी लगा है। |
| BCCI का प्रभाव | भारत आईसीसी को कंट्रोल कर रहा है। | BCCI वैश्विक क्रिकेट रेवेन्यू में 80% योगदान देता है। |
⚖️ निष्कर्ष: विरासत बनाम आधुनिक शक्ति
अंततः, **The Hundred** का यह विवाद खेल से ज्यादा पावर स्ट्रगल का मामला है। इंग्लैंड अपनी खोई हुई विरासत को बचाने की कोशिश कर रहा है, जबकि बीसीसीआई अपनी आर्थिक और सांगठनिक काबिलियत से दुनिया पर राज कर रहा है। माइकल वॉन और हैरी ब्रूक के बयान सिर्फ एक छोटी सी झलक हैं उस बड़े डर की, जो इंग्लैंड के क्रिकेट जगत में घर कर चुका है।
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